बहुत दिनों बाद याद आया बहुत
फ़ुर्सत के लम्हें उन लम्हों में फ़ुर्सत
बैठ के निहारते आसमां,सुकून से बैठ के
उम्मीद की झिलमिल रोशनी,जगाती और उम्मीद
अनायास यूं ही लिखते अनायास
अधूरे लफ़्ज अधूरे भाव, जैसे खुद हों अधूरे
- शालिनी मिश्रा तिवारी
बहुत दिनों बाद याद आया बहुत
फ़ुर्सत के लम्हें उन लम्हों में फ़ुर्सत
बैठ के निहारते आसमां,सुकून से बैठ के
उम्मीद की झिलमिल रोशनी,जगाती और उम्मीद
अनायास यूं ही लिखते अनायास
अधूरे लफ़्ज अधूरे भाव, जैसे खुद हों अधूरे
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